Archive News
Back
News Details
स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर माननीय राष्ट्रपति का संदेश
08/15/2016

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर माननीय राष्ट्रपति कासंदेश

नई दिल्ली : 14 अगस्त, 2016

 

प्यारे देशवासियो:

1.   हमारी स्वतंत्रता की 69वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर मैं देश विदेश में रह रहे अपने सभी बहनोंऔर भाइयों को हार्दिक बधाई देता हूं।

2.   अपना70वां स्वतंत्रता दिवस मनाते हुए, मैंहमारे स्वतंत्रता संग्राम के उन सभी ज्ञात और अज्ञात शूरवीरों को श्रद्धापूर्वकनमन करता हूं जिन्होंने हमें स्वतंत्रता दिलाने के लिए संघर्ष किया, कष्ट उठाया और अपना जीवन न्योछावर कर दिया महात्मा गांधी के ओजस्वीनेतृत्व से अन्तत: 1947 में अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। 1947में जब हमने स्वतंत्रता हासिल की, किसी को यहविश्वास नहीं था कि भारत में लोकतंत्र बना रहेगा तथापि सात दशकों के बाद सवा अरबभारतीयों ने अपनी संपूर्ण विविधता के साथ इन भविष्यवाणियों को गलत साबित कर दिया।हमारे संस्थापकों द्वारा न्याय, स्वतंत्रता, समता और भाईचारे के चार स्तंभों पर निर्मित लोकतंत्र के सशक्त ढांचे नेआंतरिक और बाहरी अनेक जोखिम सहन किए हैं और यह मजबूती से आगे बढ़ा है।

प्यारे देशवासियो:

3.   मैं आज पांचवीं बार स्वतंत्रतादिवस की पूर्व संध्या पर आपसे बात कर रहा हूं। पिछले चार वर्षों के दौरान, मैंने संतोषजनक ढंग से एक दल से दूसरे दल को, एकसरकार से दूसरी सरकार को और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सत्ता के शांतिपूर्णहस्तांतरण के साथ एक स्थिर और प्रगतिशील लोकतंत्र की पूर्ण सक्रियता को देखा है।राजनीतिक विचार की अलग-अलग धाराओं के बावजूद, मैंनेसत्ताधारी दल और विपक्ष को देश के विकास, एकता, अखंडता और सुरक्षा के राष्ट्रीय कार्य को पूरा करने के लिए एक साथ कार्यकरते हुए देखा है। संसद के अभी सम्पन्न हुए सत्र में निष्पक्षता और श्रेष्ठपरिचर्चाओं के बीच वस्तु और सेवा कर लागू करने के लिए संविधान संशोधन बिल का पारितहोना हमारी लोकतांत्रिक परिपक्वता पर गौरव करने के लिए पर्याप्त है।

4.   इन चार वर्षों में, मैंने कुछ अशांत, विघटनकारी और असहिष्णु शक्तियों कोसिर उठाते हुए देखा है। हमारे राष्ट्रीय चरित्र के विरुद्ध कमजोर वर्गों पर हुएहमले पथभ्रष्टता है, जिससे सख्ती से निपटने की आवश्यकता है।हमारे समाज और शासनतंत्र की सामूहिक समझ ने मुझे यह विश्वास दिलाया है कि ऐसेतत्त्वों को निष्क्रिय कर दिया जाएगा और भारत की शानदार विकास गाथा बिना रुकावट केआगे बढ़ती रहेगी।

5.   हमारी महिलाओं और बच्चों को दीगई सुरक्षा और हिफाजत देश और समाज की खुशहाली सुनिश्चित करती है। एक महिला याबच्चे के प्रति हिंसा की प्रत्येक घटना सभ्यता की आत्मा पर घाव कर देती है। यदि हमइस कर्तव्य में विफल रहते हैं तो हम एक सभ्य समाज नहीं कहला सकते। 

प्यारेदेशवासियो:

6.   लोकतंत्र का अर्थ सरकार चुनने केलिए समय-समय पर किए गए कार्य से कहीं अधिक है। स्वतंत्रता के विशाल वृक्ष कोलोकतंत्र की संस्थाओं द्वारा निरंतर पोषित करना चाहिए। समूहों और व्यक्तियोंद्वारा विभाजनकारी राजनीतिक इरादे वाले व्यवधान, रुकावट औरमूर्खतापूर्ण प्रयास से संस्थागत उपहास और संवैधानिक विध्वंस के अलावा कुछ हासिलनहीं होता है। परिचर्चा भंग होने से सार्वजनिक संवाद में त्रुटियां ही बढ़ती हैं।

7.   हमारा संविधान न केवल एकराजनीतिक और विधिक दस्तावेज है बल्कि एक भावनात्मक, सांस्कृतिकऔर सामाजिक करार भी है। मेरे विशिष्ट पूर्ववर्ती डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने पचासवर्ष पहले स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर कहा था, ‘‘हमनेएक लोकतांत्रिक संविधान अपनाया है। यह मानककृत विचारशीलता और कार्य के बढ़तेदबावों के समक्ष हमारी व्यैक्तिकता को बनाए रखने में सहायता करेगा.... लोकतांत्रिकसभाएं सामाजिक तनाव को मुक्त करने वाले साधन के रूप में कार्य करती हैं और खतरनाकहालात को रोकती हैं। एक प्रभावी लोकतंत्र में, इसके सदस्योंको विधि और विधिक शक्ति को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। कोई व्यक्ति,कोई समूह स्वयं विधि प्रदाता नहीं बन सकता।’’

8.   संविधान में राष्ट्र के प्रत्येकअंग का कर्तव्य और दायित्व स्पष्ट किया गया है। जहां तक राष्ट्र के प्राधिकरणों औरसंस्थानों की बात है, इसने मर्यादाकी प्राचीन भारतीय परंपरा को स्थापित किया है। कार्यकर्ताओं को अपनेकर्तव्य निभाने में इस मर्यादाकापालन करके संविधान की मूल भावना को कायम रखना चाहिए।

प्यारेदेशवासियो :

9.   एक अनूठी विशेषता जिसने भारत कोएक सूत्र में बांध रखा है, वह एक दूसरे की संस्कृतियों,मूल्यों और आस्थाओं के प्रति सम्मान है। बहुलवाद का मूल तत्त्वहमारी विविधता को सहेजने और अनेकता को महत्त्व देने में निहित है। आपस में जुड़ेहुए वर्तमान माहौल में, एक देखभालपूर्ण समाज धर्म और आधुनिकविज्ञान के समन्वय द्वारा विकसित किया जा सकता है। स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहाथा, ‘‘विभिन्न प्रकार के पंथों के बीच सहभावना आवश्यक है,यह देखना होगा कि वे साथ खड़े हों या एकसाथ गिरें, एक ऐसी सहभावना जो परस्पर सम्मान न कि अपमान, सद्भावनाकी अल्प अभिव्यक्ति को बनाए रखने से पैदा हो।’’

10.  यह सच है, जैसाकि 69 वर्ष पहले आज ही के दिन पंडित नेहरू ने एक प्रसिद्धभाषण में कहा था कि एक राष्ट्र के इतिहास में, ऐसे क्षण आतेहैं जब हम पुराने से नए की ओर कदम बढ़ाते हैं, जब एक राष्ट्रकी आत्मा को अभिव्यक्ति प्राप्त होती है। परंतु यह अनुभव करना आवश्यक है कि ऐसेक्षण अनायास ही भाग्य की वजह से न आएं। एक राष्ट्र ऐसे क्षण पैदा कर सकता है औरपैदा करने के प्रयास करने चाहिए। हमें अपने सपनों के भारत का निर्माण करने के लिएभाग्य को अपनी मुट्ठी में करना होगा। सशक्त राजनीतिक इच्छाशक्ति के द्वारा,हमें एक ऐसे भविष्य का निर्माण करना होगा जो साठ करोड़ युवाओं कोआर्थिक रूप से सशक्त बनाए, एक डिजीटल भारत, एक स्टार्ट-अप भारत और एक कुशल भारत का निर्माण करे। हम सैकड़ों स्मार्टशहरों, नगरों और गांवों वाले भारत का निर्माण कर रहे हैं,हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे ऐसे मानवीय, हाइटेक और खुशहाल स्थान बनें जो प्रौद्योगिकी प्रेरित हों परंतु साथ-साथसहृदय समाज के रूप में भी निर्मित हों। हमें अपनी विचारशीलता के वैज्ञानिक तरीकेसे मेल न खाने वाले सिद्धांतों पर प्रश्न करके एक वैज्ञानिक प्रवृत्ति कोप्रोत्साहन देना चाहिए और उसे मजबूत करना चाहिए। हमें यथास्थिति को चुनौती देना औरअक्षमता और अव्यवस्थित कार्य को अस्वीकार करना सीखना होगा। एक स्पर्द्धात्मकवातावरण में, तात्कालिकता और कुछ अधीरता की भावना आवश्यक गुणहोता है।

प्यारेदेशवासियो:

11.  भारत तभी विकास करेगा, जब समूचा भारत विकास करेगा। पिछड़े लोगों को विकास की प्रक्रिया में शामिलकरना होगा। आहत और भटके लोगों को मुख्यधारा में वापस लाना होगा। प्रौद्योगिकउन्नति के इस दौर में, व्यक्तियों का स्थान मशीनें ले रहीहैं। इससे बचने का एकमात्र उपाय ज्ञान और कौशल अर्जित करना और नवान्वेषण सीखना है।हमारी जनता की आकांक्षाओं से जुड़े समावेशी नवान्वेषण समाज के बड़े हिस्से को लाभपहुंचा सकते हैं और हमारी अनेकता को भी सहेज सकते हैं। एक राष्ट्र के रूप में हमेंरचनात्मकता, विज्ञान और प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देना चाहिए।इसमें, हमारे स्कूल और उच्च शिक्षा संस्थानों का एक विशेषदायित्व है।

12.  हम अकसर अपने प्राचीन अतीत कीउपलब्धियों पर खुशी मनाते हैं, परंतु अपनी सफलताओं सेसंतुष्ट होकर बैठ जाना सही नहीं होगा। भविष्य की ओर देखना ज्यादा जरूरी है। सहयोगकरने, नवान्वेषण करने और विकास के लिए एकजुट होने का समय आगया है। भारत ने हाल ही में उल्लेखनीय प्रगति की है, पिछलेदशक के दौरान प्रतिवर्ष अधिकतर आठ प्रतिशत से ऊपर की विकास दर हासिल की गई है।अंतरराष्ट्रीय अभिकरणों ने विश्व की सबसे तेजी से बढ़ रही प्रमुख अर्थव्यवस्था केरूप में भारत के स्तर को पहचाना है और व्यापार और संचालन के सरल कार्य-निष्पादन केसूचकांकों में पर्याप्त सुधार को मान्यता दी है। हमारे युवा उद्यमियों केस्टार्ट-अप आंदोलन और नवोन्मेषी भावना ने भी अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकृष्ट किया है।हमें अपनी मजबूत विशेषताओं में वृद्धि करनी होगी ताकि यह बढ़त कायम रहे और आगेबढ़ती रहे। इस वर्ष के सामान्य मानसून ने हमें पिछले दो वर्षों, जब कम वर्षा ने कृषि संकट खड़ा कर दिया था, केविपरीत खुश होने का कारण दिया है। यह तथ्य कि दो लगातार सूखे वर्षों के बावजूद भी,मुद्रा-स्फीति 6 प्रतिशत से कम रही और कृषिउत्पादन स्थिर रहा, हमारे देश के लचीलेपन का और इस बात का भीसाक्ष्य है कि स्वतंत्रता के बाद हमने कितनी प्रगति की है।

प्यारेदेशवासियो:

13.  हाल के समय में हमारी विदेश नीतिमें काफी सक्रियता दिखाई दी है। हमने अफ्रीका और एशिया प्रशांत के पारंपरिकसाझीदारों के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को पुन: सशक्त किया है। हम सभी देशों,विशेषकर अपने निकटतम विस्तारित पड़ोस के साथ साझे मूल्यों और परस्परलाभ पर आधारित नए रिश्ते स्थापित करने की प्रक्रिया में हैं। हम अपनी पड़ोस प्रथम नीतिसे पीछे नहीं हटेंगे। इतिहास,संस्कृति, सभ्यता और भूगोल के घनिष्ठ संबंधदक्षिण एशिया के लोगों को एक साझे भविष्य का निर्माण करने और समृद्धि की ओर मिलकरअग्रसर होने का विशेष अवसर प्रदान करते हैं। इस अवसर को बिना देरी किए हासिल करनाहोगा। विदेश नीति पर भारत का ध्यान शांत सह-अस्तित्व और इसके आर्थिक विकास के लिएप्रौद्योगिकी और संसाधनों के उपयोग पर केंद्रित होगा। हाल में की गई पहलों नेऊर्जा सुरक्षा में संवर्धन किया है। खाद्य सुरक्षा को बढ़ाया है और हमारे प्रमुखविकास कार्यक्रमों को आगे ले जाने में अंतरराष्ट्रीय साझीदारी का सर्जन किया है।

14.  विश्व में उन आतंकवादी गतिविधियोंमें तेजी आई है जिनकी जड़ें धर्म के आधार पर लोगों को कट्टर बनाने में छिपी हुईहैं। ये ताकतें धर्म के नाम पर निर्दोष लोगों की हत्या के अलावा भौगोलिक सीमाओं कोबदलने की धमकी भी दे रही हैं जो विश्व शांति के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।ऐसे समूहों की अमानवीय, मूर्खतापूर्ण और बर्बरतापूर्णकार्यप्रणाली हाल ही में फ्रांस, बेल्जियम, अमरीका, नाइजीरिया, केन्या औरहमारे निकट अफगानिस्तान तथा बांग्लादेश में दिखाई दी है। ये ताकतें अब सम्पूर्णराष्ट्र समूह के प्रति एक खतरा पैदा कर रही हैं। विश्व को बिना शर्त और एक स्वरमें इनका मुकाबला करना होगा।

प्यारेदेशवासियो:

15.  उन सभी चुनौतियों के लिए जो हमारेसामने हैं, मेरा प्राचीन देश के रूप में हमारी जन्मजात औरविरासत में मिली क्षमता में पूरा विश्वास है जिसकी मूल भावना तथा जीने और उत्कृष्टकार्य करने की जिजीविषा  का कभी दमननहीं किया जा सकता। अनेक बाहरी और आंतरिक शक्तियों ने सहस्राब्दियों से भारत की इसमूल भावना को दबाने का प्रयास किया है परंतु हर बार यह अपने सम्मुख प्रत्येकचुनौती को समाप्त, आत्मसात और समाहित करके और अधिक शक्तिशालीऔर यशस्वी होकर उभरी है।

16.  भारत ने अपने विशिष्ट सभ्यतागतयोगदान के द्वारा अशांत विश्व को बार-बार शांति और सौहार्द का संदेश दिया है। 1970 में इतिहासकार आर्नोल्ड टॉयनबी ने समकालीन इतिहास में भारत की भूमिका केबारे में कहा था, ‘‘आज, हम विश्वइतिहास के इस संक्रमणकारी युग में जी रहे हैं, परंतु यह पहलेही स्पष्ट होता जा रहा है कि इस पश्चिमी शुरुआत का, यदि इसकाअंत मानव जाति के आत्मविनाश से नहीं हो रहा है तो समापन भारतीय होगा।’’ टॉयनबी ने आगे यह भी कहा कि मानव इतिहास के मुकाम पर, मानवता की रक्षा का एकमात्र उपाय भारतीय तरीका है।

प्यारेदेशवासियो:

17.  मैं इस अवसर पर, हमारे सैन्य बलों, अर्द्धसैन्य और आंतरिक सुरक्षाबलों के उन सदस्यों को विशेष बधाई और धन्यवाद देता हूं जो हमारी मातृभूमि की एकता,अखंडता और सुरक्षा की चौकसी तथा रक्षा इन्हें कायम रखने के लिएअग्रिम सीमाओं पर डटे हुए हैं।

18.  अंत में मैं एक बार दोबारा उपनिषदका आह्वान करता हूं जैसा कि मैंने चार वर्ष पूर्व स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्यापर अपने संबोधन में किया था। यह भारत माता की तरह सदैव जीवंत रहेगी :

     ‘‘ईश्वर हमारी रक्षा करे

     ईश्वरहमारा पोषण करे

     हममिलकर उत्साह और ऊर्जा के साथ कार्य करें

     हमाराअध्ययन श्रेष्ठ हो

     हमारेबीच कोई वैमनस्य ना हो

     चारोंओर शांति ही शांति हो।’’

     जय हिंद!

Back